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Sanjay Mishra, Jagran


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बन्‍द करो धर्म का धन्‍धा

Posted On: 5 Mar, 2010  
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बाल ठाकरे से भी खतरनाक हैं ये

Posted On: 13 Feb, 2010  
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सम्‍मेलन नया, राग पुराना

Posted On: 31 Jan, 2010  
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janeshwar mishra ka nidhan ek yug ka awashan

Posted On: 22 Jan, 2010  
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Hello world!

Posted On: 22 Jan, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

बिलकुल ठीक कहा आपने, हम सबका कर्तव्‍य है कि भ्रष्‍टाचार के खिलाफ हर स्‍तर पर लडें। जहां तक धर्म के धंधे की बात है तो इस पर प्रहार होते रहना चाहिए। हमने उस हिन्‍दू धर्म के धंधेबाजों के बारे में लिख है जिससे मैं गहरे जुडा हूं। इसमें उन मुल्‍ला-मौलवियों का भी जिक्र है जो धर्म का धंध बनाते हैं। मेरे ख्‍याल से यह ऐसा विषय है जिस पर सभी धर्म को मानने वालों को चिन्‍ता करनी चाहिए। इसे धर्मनिरपेक्षता के राजनीतिक ताने-बाने से ऊपर आस्‍था का विषय मानते हुए समझने की जरूरत है। हम जहां है वहां के बारे में पहले सोचें। पहले खुद को ठीक करने के बारे में पहल करें। इसी से रुढियां मिटेंगी और व्‍यवस्‍था भी दुरुस्‍त होगी। आपका यह सुझाव अच्‍छा है कि हमें भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लिखना चाहिए। मै इस पर जरूर लिखूंगा। -संजय मिश्र

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सच यही है कि धर्म आज धंधा बन गया है। और धंधा जानते ही है कैसे चलता है। बाबाओं का समृद्ध संसार आस्‍था के खेल और सत्‍ता की छांव में चलता है। अब तो बाजार भी इनकी कीर्ति को एक्‍सप्‍लोर करता है। इनके आश्रमों में आधुनिक जगत की सब सुख सुविधायें हैं। किसी कारपोरेट कम्‍पनी की तरह तंत्र है।बाबाओं के आश्रम इन्‍द्रसभा है जहां अययार और अप्‍सरायें है। यहां है भोग का कभी न समाप्‍त होने वाला संसार। अपने देश की बिडम्‍बना है यहां जनता के वोट पर चुने गये लोग भी ऐसे बाबाओं का आशीर्वाद लेते हैं। उन्‍हें अब अपने सियासी मकसद के लिए बाबाओं की शरण जरूरी लगती है। जनता तो परेशान है उसके दुखों का अंत नहीं है वह अपनी दुश्‍वारियों का रास्‍ता तलाश रही है। इसी में भटक कर इन बाबाओं के आश्रम में पहुंच रही है मगर पढ़े लिखे लोग और प्रबुद्ध मीडिया क्‍या कर रहा है। हमारी हिम्‍मत तब तक इन बाबाओं का खुलासा करने की नहीं होती जब तक ये खुद नहीं फंसते। हम भी तो इनके नकली और गंदे संसार को महिमामंडित ही करते रहते हैं। अच्‍छा लेख है उम्‍मीद है बाबाओं के भण्‍डाफोड़ का क्रम जारी रहेगा।

के द्वारा:

महोदय, नमस्कार..आप किसे खतरनाक कह रहे है और किसे बहादुर..वतर्मान में यह विश्लेषण संगत युक्त नहीं है। शिवसेना और इसका जन्मदाता बालठाकरे पिंजड़े में बंद वह शेर है..जो दहाड़ सकता है..मगर किसी पर आक्रमण नहीं कर पाता है। अपने को हिंदू हितो की रक्षा करने का दावा करने वाली शिवसेना और उसका मुखिया ठाकरे..जब श्री राम मंदिर विध्वंस को लेकर हिंदू-मुसलमान दंगा हुआ था तब कहा थी उसकी हिंदूवादी मानसिकता। आज तक देश में जहा भी कही हिदुओं पर अत्याचार हुए है उन जगहों पर कभी भी बालठाकरे क्यों नहीं गए..। शिवसेना ने कभी भी मुसलमान डान की खिलाफत नहीं की है..जबकि मुंबई दुनिया भर के अधिकांश मुसलिम डान के लोगों का अड्डा बनी हुई है। हमने आज तक नहीं सुना है कि शिवसेना ने मुसलमान को मारा पीटा हो। किसी पंजाबी या सरदार को उत्तर भारतीय कहकर धक्कियाया हो। मुंबई में बालठाकरे और राज ठाकरे जो भी तानाशाही भरा फतवा जारी करते है..उससे देश के अन्य सभी जगहों पर स्थापित शिवसेना के लोगों को शर्मिंदगी और जलालत उठानी पड़ती है। भले ही इन जगहों पर शिवसेना का वोट बैंक न के बराबर है, लेकिन सच यहीं है कि ऐसी वारदाते शर्म से सिर को नीचे झुका देती है। श्री राम मंदिर के विवाद के बाद ही सारे देश में शिवसेना और बजरंग दल तथा विहिप अचानक ही रातो रात प्रकाश में आए और आकाश में छा गए। शिवसेना की उत्तर भारत में भी शाखाए है..उनमें कही भी मराठी नहीं है..अगर मराठावाद पर ही राजनीति करनी है, तो शिनवसेना के मुखिया बालठाकरे और राजठाकरे को चाहिए कि मुंबई को छोड़कर देश में अन्य जितनी भी शिवसेना की शाखाएं है..उनकी मान्यता को रद्द कर दे। हिंदू हितो की बात करने वाला ठाकरे की सेना निहत्थे हिंदुओं पर ही वार करती है..किसी पंजाबी, सरदार और मुसलमान पर नहीं। बिहार..यूपी, मध्यप्रदेश और राजस्थान आदि प्रदेशों के लोग जहां भी जाते है वहां पर विकास की कड़ी का अभिन्न अंग बन जाते है। ठाकरे चिड़िया घर के पिंजड़े में बंद वह शेर है जो जंगली जानवारों को देखने के लिए आने वाले दर्शकों को अब मराठावाद की दहाड़ मारकर अपनी मौजूदगी का अहसास ही कराता रहता है। जबकि मराठी लोगों का इतिहास इतना स्वर्णिम रहा है कि लोग उसकी दुहाई देते हुए नहीं थकते है। हमलोगों ने बचपन में किताबों में मराठा सरदार छत्रपति शिवाजी की बहादुरी और इंसानियत की जितनी भी गाथाएं पढ़ी थी..उन सभी ने मुझकों शिवाजी के प्रति नतमस्तक ही किया है। बाजीराव के वंशज पर शिवसेना जो कलंक लगा रही है, उसे इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। अखंड भारत की कल्पना करने वाले इन्ही योद्धाओं को इतिहास नें अपने सीने में जगह दी है, इन लोगों ने मुगलों से जमकर टक्कर ली थी। आज ठाकरे वंशज मराठा लोगो की वीरगाथाओं को जगह जगह कंलकित कर रहे है।

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ठाकरे एंड कंपनी देश की जनता को बरगला नहीं सकते। हर कोई जानता है कि राष्‍ट्र तो एक ही है। महाराष्‍ट्र भी उसीमें समाहित है। यह संविधान प्रदत्‍त दर्जा है। और कोई भी व्‍यक्ति देश व संविधान से ऊपर नहीं हो सकता।अगर कोई ऐसा कर रहा है और करने दिया जा रहा है तो दोषी कौन है। क्‍या ऐसे लोगों का काम सिर्फ बयान देना है।क्‍या कानून सिर्फ आम लोगों के लिये है। अगर सबके लिये है तो क्‍या ठाकरे एंड कंपनी राष्‍ट्रदोह नहीं कर रही है। कर रही है तो उसकी सजा क्‍या है। है तो उसे कौन क्रियान्वित कराएगा। क्‍यो नहीं हो रहा है यह हर चीज को राजनीतिक नफे नुकशान के चश्‍में से देखने वालों से पूछिए। इनके लिये अपना हित ही सर्वोपरि है देश गौड। पर आखिर ऐसे बंदरों को उस्‍तरा किसने पकडया है। जब हम'आप सब देश का बंटाढार करने पर ही तुले हैं तो और ठाकरे पैदा होंगे। रही देश की बात तो इसे भगवान ही चला रहा है।

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भाई संजय तुम्‍हारी इतनी पवित्र आकांक्षायें जो उस बच्‍चे की जिद की तरह है जो चांद मांगता है। समझो इस देश में यही खेल चलेगा। बाल ठाकरे कहीं बाहर से आयातित नहीं हैं। वे इसी देश की सड़ाध मारती राजनीति की ही पैदाइश हैं। हमारे दुख, हमारी वंचनायें, हमारी कोमल गांधार भावनायें, सब कैश होते हैं उनकी सियासत के लिए। क्‍या करोगे आडवानी का, बुद्धदेव का या फ‍िर चिंदम्‍बर का। उनके कपार चढ़ी मल्‍टीनेशनल कम्‍पनियां, विश्‍व बैंक और आईएमएफ। कसम खाई है सनम तेरे मुनाफे और कारोबार की गारंटी की। लिहाजा देश में वह सबकुछ होगा जो उन्‍हें मुफीद लगे। लोग खित्‍ते खित्‍ते में लड़ेगें नहीं तो राज करने का मजा क्‍या। चुनाव आयोग से उम्‍मीद करते हो मुझे हंसी आ रही है। भोले और बुद्धु मत बनो। आयोग किसका है। वैसे तुम्‍हारी भावनाओं सम्‍मान क्‍योंकि चलो भ्रम ही सही, बदलाव के लिए कुलबुलाते तो हो।

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अंग्रेजी में काम न होगा, फिर से देश गुलाम न होगा। गांधी लोहिया की अभिलाषा, चले देश में देसी भाषा। संसोपा ने बांधी गांठ, पावें पिछड़े सौ में साठ। जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा। आदि नारों को हर क्षण जीने वाले और जागते रहो का अलख जगाने वाले लिटिल लोहिया जनेश्‍वर मिश्र सदा- सदा के लिए खुद सो गए पत्रकार राघवेंद्र दुबे, सपा प्रवक्‍ता राजेद्र चौधरी जैसे हजारों फक्‍कड़ों और सपा अध्‍यक्ष मुलायम सिंह यादव जैसे दमदार दोस्‍तों को अकेला छोड़कर। युवजनों के इस अमर साथी और समाजवादी सेनापति को अंतिम सलाम के साथ संजय मिश्र जी आपकी कलम के प्रति भी आभार लड़ते- लड़ते की याद दिलाने के लिए।

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